बाढ़ की तबाही से जल प्रबंधन फिर एक बार सुर्खियों में है, मगर एक और तरह की जल चिंता हाल में स्वीडन की राजधानी स्टाकहोम में ‘विश्व जल सप्ताह’ में व्यक्त की गई थी और उसमें आशंका व्यक्त की गई कि यदि इस अति-महत्वपूर्ण संसाधन के दुरुपयोग को नहीं रोका गया, तो धरती की बढ़ती आबादी के लिए भोजन और पेयजल की समस्या का समाधान खोजना मुश्किल होगा।
इस आशय का रहस्योद्घाटन हुआ कि विश्व की खाद्य सामग्री का 50 प्रतिशत हिस्सा बर्बाद हो जाता है, अत: इसके उत्पादन में जो पानी का इस्तेमाल होता है, वह प्रतिवर्ष बेकार जाता है। यदि खाद्य सामग्री की बर्बादी कम से कम 50 प्रतिशत नहीं रोकी गई तो विचारकों की राय में 2025 तक भोजन और पेयजल की भारी समस्या खड़ी होगी। कुवैत जहां पानी मुफ्त मिलता है, प्रति व्यक्ति 600 लीटर पानी प्रतिदिन वहां इस्तेमाल होता है।
इसके विपरीत स्वीडन में, जहां पानी के लिए कीमत देनी पड़ती है, वहां लोग 150 लीटर प्रतिदिन से ही काम चलाते हैं। इसका मतलब है कि पानी की समस्या का समाधन तलाशना है तो इसके उपयोग के लिए उचित मूल्यनीति अख्तियार करनी चाहिए। लोगों को पानी के पर्यावरणीय महत्व का ज्ञान भी कराना आवश्यक है। इस आशय का प्रचार होना चाहिए कि पानी एक मूल्यवान व सीमित संसाधन है, जिसका इस्तेमाल संभलकर करने की जरूरत है।
भारत को स्टाकहोम पानी सम्मेलन के संवाद से सबक लेना जरूरी है। भारत ने अभी तक पानी की समस्या पर गहराई से विचार नहीं किया है। सीमित पानी के स्टॉक के उपयोग के लिए न तो कोई योजना बनाई है और न ही लाभकारी इस्तेमाल का आचरण अख्तियार किया है। पहला, भारत में जलभंडार सीमित है, दुनिया में नदियों के पानी का सिर्फ ४ प्रतिशत पानी ही भारत में उपलब्ध है। यहां पानी मानसून पर निर्भर करता है, जिसका चरित्र स्थायी नहीं है। कभी बाढ़ तो कभी सूखे से गुजरना पड़ता है।
अधिकांश वष्र साल में 100 घंटे होती है। अत: इसके लिए गहन योजना आवश्यक है। दूसरा, भारत कृषिप्रधान देश है। अनुभव बताता है कि गरीबी से निपटने के लिए कृषि विकास की प्रधानता आने वाले दिनों में भी रहेगी। पहली हरित क्रांति की सफलता पानी की उपलब्धता के कारण हुई। दूसरी प्रस्तावित हरित क्रांति की सफलता भी पानी पर ही निर्भर करेगी। तीसरा, आर्थिक सोच में भी बदलाव आया है। पानी प्रकृति प्रदत्त है, लेकिन सीमित उपलब्धता और इसके लगातार दूषित होने के कारण मुफ्त और मनमाने तरीके से इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। आठवीं योजना के दौरान पानी को आर्थिक संसाधन की मान्यता दी गई है।
दुनिया के स्तर पर पानी की समस्या गंभीर होती जा रही है। विचारकों का अनुमान है कि आने वाले दिनों में पानी को लेकर ही विश्व में तनाव होने वाला है। भारत में पानी को लेकर कई स्तरों पर संघर्ष चल रहा है। कई राज्यों के बीच पानी के बंटवारे को लेकर संघर्ष है। न तो केंद्र सरकार और न ही न्यायालय राज्यों के आपसी द्वंद्व को सुलझाने में कामयाब हुए हैं। इसी तरह विभिन्न आर्थिक क्षेत्रों के बीच पानी के बंटवारे को लेकर सामंजस्य स्थापित करने की समस्या खड़ी हुई है।
भारत में 1990 में ८३ प्रतिशत पानी का इस्तेमाल सिंचाई के लिए होता था। 2025 में यद्यपि कृषि के विकास के लिए अधिक पानी की जरूरत होगी, सिंचाई के लिए पानी का अनुपात घटकर ७५ प्रतिशत हो जाएगा। इसी तरह घरेलू उपयोग में भी अधिक पानी मुहैया कराने की जरूरत पड़ेगी। शहरों के विकास के कारण भारत की नदियों का पानी दूषित हो रहा है। ‘स्वजल धारा’ योजना के तहत घरेलू इस्तेमाल के लिए पानी की योजना लागू की गई है, लेकिन राजस्थान के स्वजल धारा के मूल्यांकन के निष्कर्ष से पता चला है कि कमजोर तबके के लोगों को स्वजल धारा के तहत पानी नहीं मिल पाता है। पिछले वर्षो में जमीन से पानी निकालने की सुविधा के कारण पानी का स्तर लगातार कम होता जा रहा है।
‘जल ही जीवन है’ की कहावत को यदि सरजमीं पर उतारना है तो पानी के कई पक्षों पर गहराई से विचार कर नीति निर्धारित करनी होगी। देश का तेज विकास हो रहा है। अनुमान है कि 2025 में 350 मीट्रिक टन अनाज की जरूरत होगी। देहातों में भी शुद्ध जल की आवश्यकता बढ़ जाएगी, क्योंकि जल प्रदूषण की रफ्तार तेज है। उद्योगों को भी अधिक पानी चाहिए। ‘डबलीन-सिद्धांत’ यह प्रतिपादित करता है कि ‘पानी का इसके सभी तरह के इस्तेमालों में आर्थिक महत्व है और इसे आर्थिक वस्तु की मान्यता मिल जानी चाहिए।’
इस सिद्धांत ने उस परंपरागत मान्यता को समाप्त कर दिया है, जिसमें यह माना गया था कि पानी प्रकृति का मुफ्त का उपहार है और इसलिए इसे पाने का सभी को मानवीय अधिकार है।
‘राष्ट्रीय जल नीति’ (2002) की स्पष्ट धारणा है कि ‘जल संसाधन के विभिन्न उपयोगों के प्रबंधन में सहभागी नीति अख्तियार करनी चाहिए। इसके लिए केवल सरकारी महकमों को नहीं, बल्कि उपभोक्ता और इससे जुड़े दूसरे लोगों को योजना, डिजाइन और प्रबंधन में प्रभावकारी और निर्णायक ढंग से सम्मिलित करना चाहिए।’
प्रबंधन की नई सोच के मुताबिक सरकार के नियंत्रण को कम करना जरूरी है और उसके स्थान पर उपभोक्ताओं को अधिकार दिया जाए कि वे स्वयं दूसरा इंतजाम करें। केंद्र सरकार द्वारा ‘साझेदार सिंचाई प्रबंधन’ के लिए एक एक्ट भी प्रस्तावित है, जिसे दस राज्यों ने लागू किया है। इसमें ‘वाटर यूजर एसोसिएशन’ पर अधिक जोर दिया गया है। स्वामीनाथन कमेटी की राय है कि इस नीति के तहत गरीब किसानों को भी निर्णायक मंडल में शामिल किया जाना चाहिए।
उम्मीद की जाती है कि जब उपभोक्ता के हाथ में उपलब्ध पानी के व्यवस्था की जवाबदेही होगी, तो पानी की बर्बादी रुकेगी और वितरण उचित होगा, लेकिन व्यवहार में कई खामियां नजर आ रही हैं। खबर है कि राजनीतिक दखलंदाजी से इसका काम प्रभावित होता है। हर हालत में जवाबदेह उपभोक्ता की (चाहे वह किसान हो या स्वजल धारा का सदस्य) नितांत जरूरत है, जिसके लिए जनचेतना अभियान चलाना चाहिए।
मंगलवार, 16 सितंबर 2008
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